अं
क्ष त्र ज्ञ लृ श्र अः
सार्वभौमिक वर्ण समुच्चय
यूनिकोड नामदेवनागरी अक्षर
देवनागरीU+0905
  1. यह देवनागरी लिपि का पहला वर्ण है।
  2. यह स्वर वर्ण है। इसका उच्चारण स्थान कंठ है। इसे कंठ्य वर्ण भी कहते हैं।
  3. इसे उपसर्ग के रूप में लगाकर हिन्दी में बहुत से विशेषण शब्दों का विलोमार्थी शब्द बनाया जाता है। जैसे- असमर्थ, अविकसित,

उच्चारण

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प्रकाशितकोशों से अर्थ

शब्दसागर

अ संस्कृत और हिंदी वर्णमाला का पहला अक्षर । इसका उच्चारण कंठ से होता है इससे यह कंठय वर्ण कहलाता है । व्यंजनों का उच्चारण इस अक्षर की सहायता के बिना अलग नहीं हो सकता इसी से वर्णमाला में क, ख, ग आदि वर्ण अकार- संयुक्त लिखे और बोले जाते हैं । विशेष—अक्षरों में यह सबसे श्रेष्ठ माना जाता हैं । उपनिषदों में इसकी बडी महिमा लिखी है । गीता में श्रीकृष्ण ने कहा है—'अक्षराणामकारोस्मि' । वास्तव में कठे खुलते ही बच्चों के मुख से यह अक्षर निकलता है । इसी से प्रायः सब वर्णमालाओं में इसे पहला स्थान दिया गया है । वैयावरणों ने मात्राभेद से तीन प्रकार का माना है, ह्रस्व जैसे— अ; दीर्घ जैसे—आ;प्लत जैसे — अ३ । इन तीनो में से प्रत्येक के दोदो भेद माने गए हैं; सानुनासिक और नीरनुनासिक । सान्- नासिक का चिह्न चंद्रबिदुँ है, । तंत्रशास्त्र के अनुसार यह वर्णमाला का पहाला आक्षर इसलिये है कि यह सृष्टि उत्पन्न करने के पहले सृष्टिवर्त की आकुल अवस्था की सूचित करता है ।

अ ^१ उप॰ संज्ञा और विशेषण शब्दों के पहले लगकर यह उनके अर्थों में फेरफार करता है । जिस शब्द के पहले यह लगाया जाता है उस शब्द के अर्थ का प्रायः अभाव सूचित करता है; जैसे, अकर्म, अन्याय, अचल । कहीं कहीं यह अक्षर शब्द के अर्थ को दूषित भी करता है जै॰—अभागा, अकाल, अदिन । स्वर से आरंभ होनेवाले शब्दों के पहले जब इस अक्षर को लगाना होता है तब उसे 'अन्' कर देते है; जैसे, अनंत, अनेक अनीश्वर । पर हिंदी में कभी व्यंजन के पहले भी 'अन्' के 'न्' को सस्वर 'न' करके 'अन' लगा देते हैं; जैसे, अनबन, अनरीति, अनहोनी आदि । संस्कृत वैयाकरणों ने इस निषेधसूचक उपसर्ग का प्रयोग इन छह अर्थों में माना हैः (१) सादृश्य; यथा—अब्राह्मण = ब्राह्मण के समान आचर रखनेवाला अन्य वर्ण का मनुष्य । (२) अभाव; यथा—अफल = फलरहित; अगुण = गुणरहित । (३) अन्यत्व; यथा— अघट = घट से भिन्न, पट आदि । (४) अल्पता; यथा—अनुदरी कन्या = कृशोदरी कन्या । (५) अप्राशस्त्य । बुरा; यथा—अभाग । अधन = बुरा धन । (६) विरोध; यथा—अधर्म = धर्म के विरुद्ध आचरण । अन्याय, आदि । हिंदी में इसका प्रयोग कुछ लोग स्वार्थिक रूप में भी मानते है, जैसे अलोप = लोप ।

अ ^२ संज्ञा पुं॰ [सं॰]

१. विष्णु ।

२. शिव (को॰) ।

३. ब्रह्मा ।

४. विराट ।

५. इंद्र ।

६. वायु ।

७. कुबेर ।

८. अग्नि ।

९. विश्व ।

१०. सरस्वती ।

११. अमृत ।

१२. कीर्ति ।

१३. ललाट ।

१४. प्रणव (को॰) ।

१५. यम (को॰) ।

१६. प्राण (को॰) ।

अ ^३ वि॰

१. रक्षक ।

२. उत्पन्न करनेवाला ।