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प्रकाशितकोशों से अर्थसंपादित करें

शब्दसागरसंपादित करें

मोती ^१ संज्ञा पुं॰ [सं॰ मौतिक, प्रा॰ मौत्तिअ]

१. एक प्रसिद्ध बहुमूल्य रत्न जो छिछले समुद्रों में अथवा रेतीले तटों के पास सीपी में से निकलता है । विशेष—समुद्र में अनेक प्रकार के ऐसे छोटे छोटे जीव होते है, जो अपने ऊपर एक प्रकार का आवरण बनाकर रहते हैं । इस आवरण को प्रायः सीप और उन जीवों को सीपी कहते हैं । कभी कभी ऐसा होता है कि बालु का कण या कोई बहुत छोटा जीव सीप में प्रवेश कर जाता है, जिसके कारण सीपी के शरीर में एक प्रकार का प्रदाह उत्पन्न होने लगता है । उस प्रदाह को शांत करने के लिये सीपी अनेक प्रयत्न करती है पर जब उसे सफलता नहीं होती, तब वह अपने शरीर में से एक प्रकार का सफेद, चिकना और लसीला पदार्थ निकालकर बालु के उस कण अथवा जीव को चारों ओर से ढकने लगती है, जो अंत में मोती का रुप धारण कर लेता है । तात्पर्य यह कि मोती की सृष्टि किसी स्वाभाविक प्रक्रिया के अनुसार नहीं होती, बल्कि अस्वाभिक रुप में होती है; और इसीलिये बहुत दिनों तक लोग यह समझते थे कि मोती की उत्पत्ति सीपी में किसी प्रकार का रोग होने से होती है । हमारे यहाँ प्राचीन काल में यह माना जाता था कि स्वाती की वर्षा के समय सीपी मुँह खोलकर समुद्र के ऊपर आ जाया करती है; और जब स्वाती की बुँद उसमें पड़ती है, तब मोती उत्पन्न होता है । साधारण मोती सुडौल और गोल होता है, पर कुछ मोती लंबोतरे; टेढ़े मेढ़े या बेडौल होते हैं । मोती का रंग मटमौला, धुमिल, काला या कुछ हरापन अथवा नीलापन लिए हुए होता है; पर साफ करने पर वह खुब सफेद हो जाता है औऱ उसमें एक विशेष प्रकार की 'आब' या चमक आ जाती है । मोती जितना बड़ा सुडौल होता है उसका मूल्य भी उतना ही अधिक होता है । यों तो मोती संसार के अनेक भागों में पाए जाते हैं; पर लंका फारस की खाड़ी तथा आस्ट्रेलिया के पश्चिमी तट के मोती बहुत अच्छे समझे जाते हैं । इसके अतिरिक्त पनामा के पीले मोती तथा कैलिफोर्निया की खाड़ी के काले और भुरे मोती भी बहुत अच्छे होते हैं । मोती प्रायः तौल के हिसाब से बिकते हैं, पर अन्यान्य रत्नों की भाँति मोती की दर भी उसके भार की वृद्धि के अनुसार बहुत बढ़ती जाती है । उदाहरणार्थ यदि एक चौ के मोती का दाम ५०) होगा, तो उसी प्रकार के दो चौ के मोती का दाम २००) और पाँच चौ के मोतीदाम १२५०) या इससे भी अधिक हो जाएगा । भारतवर्ष में मोती का व्यवहार बहुत प्राचीन काल से चला आता है । धनवान् लोग इसकी प्रायः मालाएँ बनवाते हैं, और इन्हें अगुँठियों तथा दुसरे आभूषण में जड़वाते है । इसका व्यवहार वैद्यक में औषध रुप में भी होता है; और प्रायः वैद्य लोग इसका भस्म तैयार करते हैं । वैद्यक में मोती को शीतवीर्य शुक्रवर्धक, आँखों के लिये हितकारी और शरीर को पृष्ट करनेवाला माना है । हमारे यहाँ प्राचीन ग्रंथों में यह भी कहा गया है कि सीपी और शंख आदि के अतिरिक्त हाथी, साँप, मछली, मेंढक, सुअर, बाँस और बादल तक में मोती होते है; और इनको प्राप्त करनेवाला बहुत सौभाग्यशाली कहा गया है । इन सब मोतियों के अलग अलग गुण भी बतलाए गए हैं; पर ऐसे मोती कभी किसी के देखने नें नहीं आते । मुहा॰—मोती गरजना =मोती में बाल पड़ जाना । मोती चटकना या कड़क जाना । मोती ढलकाना =रोना (व्यंग्य) । मोती पिरोना =(१) बहुत ही सुंदर और प्रिय भाषण करना । (२) बहुत ही सुंदर और स्पष्ट अक्षर लिखना । (३) रोना (व्यंग्य) । (४) कोई बारीक काम करना । मोती बींधना =(१) मोती को पिरोए जाने के योग्य बनाने के लिये उसके बीच में छेद करना । (२) कुमारी का कौमार्य भंग करना । योनि का क्षत करना । (बाजारु) । मोती रोलना =बिना परिश्रम अथवा थोड़े परिश्रम से बहुत अधिक धन कमाना या प्राप्त करना । मोतियों के मोल पड़ना =बहुत महँगा पड़ना । उ॰—किंतु यह फल बकरियों और खच्चरों पर लादकर रेल तक पहुँचाने में मोती के मोल पड़ेंगे, उन्हें कौन खरीदेगा ।—किन्नर॰, पृ॰ ११ । मोतियों से माँग भरना =माँग में मोती पिरोना । मोतियों से मुँह भरना = प्रसन्न होकर किसी को बहुत अधिक धन संपत्ति देना । पर्या॰—मौक्तिक । शौक्तिक । मुक्ता । मुक्ताफल ।

२. कसेरों का एक औजार जिससे वे नक्काशी करते समय मोती की सी आकृति बनाते हैं ।

मोती ^२ संज्ञा स्त्री॰ [सं॰ मौक्तिकी] बाली जिसमें बड़े बड़े मोती पड़े रहते हैं । उ॰—छोटी छोटी मोती कान छोटे कठुला त्यों कंठ छोटे से बिजायठ कटक दुति मोटे हैं ।—रघुराज (शब्द॰) ।